रविवार, 27 सितंबर 2009

डॉक्टर आर.एन.सिंह की ललकार:'दिमागी बुखार रहेगा या मैं'

गोरखपुर के सुमेर सागर स्थित शंकर क्लिनिक पर रोज की  तरह आज भी पैर रखने की जगह नहीं है. करीब तीन सौ वर्ग फीट की जगह में मरीज़ भरे पड़े हैं. सहायक पसीने से तरबतर हैं. शीशे से बंद केबिन में एसी ना चलने की वजह से हर शख्स कि हालत ख़राब है. अन्दर-बाहर गर्मी के मारे बच्चों का बिलखना माहौल को और मुश्किल बना रहा है. लेकिन इन मुश्किल हालात का, बिलकुल सफ़ेद बालों वाले उस 'उभरते मसीहा' की शख्सियत पर जरा भी असर नहीं पड़ता.  अवकाश प्राप्ति की उम्र के करीब पहुँच चुके उस शख्स का नाम आज किसी तार्रुफ़  का मोहताज़ नहीं. डॉक्टर आर. एन.सिंह! एन्सेफलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पैनर  डॉक्टर आर.एन.सिंह ने एक ऐलान किया है. ऐलान है पूर्वांचल के मासूमों को जानलेवा बीमारी 'जापानी एन्सेफलाइटिस' के चंगुल से छुटकारा दिलाने का. वरना ....गोरखपुर छोड़ देने का. डॉक्टर आर.एन.सिंह ने मेरठ मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. करने के बाद गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ज्वाइन किया था. इसी दरमियाँ सन १९७८ में जानलेवा बीमारी एन्सेफलाइटिस महामारी की शक्ल में सामने आई. मेडिकल कॉलेज में हंगामा मच गया. ३२ साल पहले उस खौफनाक मंज़र को याद कर डॉक्टर सिंह आज भी खुद पर लानत देने लगते हैं. ''आखिर मैं इस कदर बच्चों को अपनी आँखों के सामने मरते देखने को मजबूर क्यों हुआ? मैं कुछ कर क्यों नहीं सका? मेरी पढाई का आखिर क्या मतलब निकला?"  डॉक्टर सिंह को सरकारी मुलाजिम बनने की कोई ख्वाइश नहीं थी. वे तो बस यहाँ अपनी डिग्री के मायने तलाशने आये थे.  लेकिन साल दर साल हजारों बच्चों कि बेबस मौतों ने उनके लिए 'बच्चों का डॉक्टर' होने का मतलब ही बदल दिया है. सन २००५ (वो साल जब डॉक्टर सिंह ने अपना अभियान शुरू किया था ) से आज तक शायद ही कोई ऐसा  दिन गया हो जब उन्होंने  इस बडे मकसद के लिए काम ना किया हो.
सन २००५ यानि  एन्सेफलाइटिस का तांडव शुरू होने के २८ साल बाद तक पूर्वांचल में कोई संगठन या राजनितिक दल इस काम के लिए आगे नहीं आया था. मीडिया में हर साल मौतों के आंकड़े छपते थे. लोग सिर्फ इतना जानते थे की एक बीमारी है, जिसने हजारों बच्चों को अपना शिकार बनाया है. लेकिन इससे मुकाबला कैसे किया जाये. अपने बच्चों को इसके चंगुल से बचाया कैसे जाये किसी को मालूम नहीं था. बल्कि कोई इस बारे में सोचना भी नही चाहता था. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में कभी डॉक्टर सिंह के साथी रहे डॉक्टर के.पी.कुशवाहा और बाल रोग विभागाध्यछ रहे डॉक्टर वाई.डी.सिंह (मौजूदा एम.एल.सी)   दिन रात जूझते रहते थे. वार्ड नंबर ६० में डॉक्टर ए.के.राठी की आवाज़ गूंजती रहती थी. लेकिन नतीजा सिफर. हर साल उसी गति से बच्चे मरते और मरते जाते थे.
सब जानते थे कि इन बच्चों को बचाने का अकेला हथियार वो टीका है जिसे चाइना से आयात करना पड़ेगा. लेकिन जब इलाके के नेताओं को सांप सूंघ गया हो तो सरकार से इसकी दरखास्त कौन करता? और सरकार सिर्फ दरखास्त से मान क्यों जाती?  तब सन २००५ में डॉक्टर आर.एन.सिंह ने अपना आन्दोलन शुरू किया. गोरखपुर,कुशीनगर, देवरिया,बस्ती,महराजगंज आदि जिलों में काली पट्टियां बांधकर जूलूस निकाले. एक लाख से जयादा मांगपत्र प्रधानमंत्री को भेजे गये. मीडिया में इन ख़बरों की सुर्खियाँ और  एन्सेफलाइटिस की महामारी ने तत्कालीन राज्यपाल टी.वी.राजेश्वर को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के दौरे के लिए मजबूर कर दिया. फिर बारी-बारी राहुल गाँधी, सलमान खुर्शीद, मुलायम सिंह सब पहुंचे. मुलायम सिंह ने मुआवजे का एलान किया. राहुल ने मनमोहन सिंह के जरिये  टीकों का आयात करवाया. जापानी एन्सेफलाइटिस के ये टीके युधस्तर पर  लगवाए गये. इन टीकों का आयात चाइना से किया गया था. टीके बनाने वाली कम्पनी के मुताबिक कम से कम दो डोज़ लगाने पर ही ये टीके कारगर होते हैं. लेकिन केंद्र सरकार को लगा कि हिन्दुस्तानी बच्चों को इसकी एक ही डोज़ लग जाये तो बहुत. सो, बस एक डोज़ लगवाकर सरकार ने अपना काम पूरा कर लिया. नतीजतन जिन बच्चों को टीका लगा वे भी इस बीमारी के प्रकोप से बच नही सके.
सूबे में सरकार बदली तो नई मुख्यमंत्री मायावती  ने मुलायम सिंह द्वारा दिया गया मुआवजा बंद कर दिया. बच्चे यूँ ही मरते और विकलांग होते जा रहे हैं. डॉक्टर आर.एन.सिंह ने अपना और अपने लोगों का खून बहाना शुरू कर दिया है. उन्होंने केंद्र सरकार को एन्सेफलाइटिस उन्मूलन के लिए बिन्दुवार कार्यक्रम सौंपा है. जिसे रास्ट्रीय स्तर पर रास्ट्रीय एन्सेफलाइटिस उन्मूलन अभियान (नीप) या किसी और नाम से लागू करने की उनकी मांग है. डॉक्टर आर.एन.सिंह, उनके पिता रामशंकर सिंह, पत्नी डॉक्टर वीणा सिंह, बहन  स्नेह सिंह, दामाद मनीष सिंह, सुरजीत सिंह, बेटी विष्णुप्रिया, लिटिल,  नाती नोनू, लावण्या सिंह सहित परिवार, अनुवाई और मित्रमंडली का एक-एक सदस्य इस अभियान से जुड़ा है. दशहरा के अवसर पर जब सारा संसार राम (अच्छाई) द्वारा रावन (बुराई) के वध का पर्व रावन को जला कर मना रहा है, डॉक्टर सिंह, अपने लोगों के साथ खून से चिठ्ठियाँ लिखकर माँ भवानी से, पूर्वांचल के बच्चों को निवाला बनाते, एन्सेफलाइटिसइस रूपी महिसासुर के, वध की प्रार्थना कर रहे हैं. डॉक्टर सिंह और उनके साथी इसके पहले खून से लिखे हजारों पत्र प्रधानमंत्री, रास्त्रपति, लोकसभा स्पीकर और यू.पी.ए. अध्यछ सोनिया गाँधी  को भेज चुके हैं. डॉक्टर सिंह का ये ऐलान उनका समर्पण व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है, 'अगले पांच सालों में पूर्वांचल में या तो जापानी एन्सेफलाइटिस होगी या मैं!'

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