बुधवार, 30 सितंबर 2009
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
मैया करेगी एनसेफ़लाईटिस का नाश
३२ साल से पूर्वी उत्तर प्रदेश में हजारों मासूमों की मौत का सबब बन रही एन्सेफलाइटिस अब माँ भवानी के हाथों मारी जायेगी. विजयदशमी को जब सारी दुनिया में रावन जलाया जा रहा था तो गोरखपुर के लोग माँ भवानी को अपने खून से चिट्ठयां लिख रहे थे. सूरजकुंड स्थित 'निरामय' चिकत्सालय में नीप के चीफ कम्पेनर डॉक्टर आर.एन.सिंह की अगुवाई में लोगों ने ये चिट्ठियां लिखीं. इस मौके पर डॉक्टर सिंह ने कहा कि पिछले ४ साल में केंद्र सरकार को हजारों चिट्ठियां लिख-लिख कर वे थक चुके हैं इसलिये अबकी बार सीधे माँ से गुहार लगाईं है. उन्हें पूरी श्रद्धा है की माँ उनकी फरियाद जरूर सुनेगी. अपने खून से चिट्ठियां लिखने वालों में डॉक्टर सिंह के अलावा मुख्य रूप से सर्वश्री रामशंकर सिंह, डॉक्टर वीणा सिंह, स्नेह सिंह, डॉक्टर मनीष सिंह, डॉक्टर विस्नुप्रिया सिंह, सुरजीत सिंह, लिटिल सिंह आदि शामिल थे.
रविवार, 27 सितंबर 2009
भगत सिंह तुम वापस आओ
बुनियादी तौर पर हम सब दुनिया को बेहतर शक्ल में देखना चाहते हैं. लेकिन जब बात ब्यवहारिकता की आती है तो हमें सबसे पहले सिर्फ हम और हमारे साथ वाले दिखते हैं. दरअसल ऐसा करते वक्त हम खुद को पैदाइशी बुद्धिमान मानकर ठेठ दुनियादारी का फ़र्ज़ निभा रहे होते हैं. लेकिन सच ये है कि ये दुनिया सिर्फ हम जैसे दुनियादारों की बदौलत नहीं चलती बल्कि इसे चलाने और बेहतर बनाने के लिए कुछ ऐसे जूनूनियों की जरुरत पड़ती है जो अपने खून के ईधन से क्रांति का पहिया आगे बढा सकें. २७ सितम्बर को ऐसे ही एक महावीर जुनूनी का जन्मदिन है.
जी हाँ ठीक पहचाना आपने, सरदार भगत सिंह!बचपन में खेत में बंदूकें बोने वाला ये महान क्रन्तिकारी आज भी हमारे देश में परिवर्तन के हामी लाखों नौजवानों की प्रेरणा का स्रोत है. भगत सिंह ने सिर्फ अंग्रेजो से आजादी का नहीं बल्कि भूख, गरीबी और असमानता से मुक्ति का सपना देखा था. हमें आज़ादी तो मिली लेकिन भगत सिंह का सपना आज भी अधूरा है. आज के नौजवान होने के नाते ये जिम्मेदारी हमारी भी है के हम भगत सिंह के उस सपने को साकार करें. हम जिस किसी पेशे में हैं वहां चीजों को बेहतर बनाने के कोशिश करें. भूख, गरीबी और असमानता को मिटाने के लिए जो कुछ कर सकते हैं, जरुर करें. हमारी ओर से भगत सिंह को यही सच्ची श्रधान्जली होगी.
साहब को बाथरूम में तो जीने दो
यू.पी के अफसरों अब बाथरूम में भी चैन नही मिलने वाला. अरे भाई यही तो एक जगह थी जहाँ हज़रात आराम से आराम फरमाते थे. इस जगह पर फाईलें तो फाइले फ़ोन तक से छुटकारा था. घंटी बजती रहती थी लेकिन साहब बाथरूम से निकलने का नाम नहीं लेते थे. लेकिन अब साहब ऐसा नहीं कर पाएंगे. फ़ोन नहीं उठाना तो दूर साहब ने मोबाइल भी स्विच किया तो गये काम से. दरअसल, सूबे की मायावती सरकार ने साफ-साफ कह दिया है कि अफसरों की यह नाफरमानी नाकाबिले बरदाश्त है।
बकायदा आदेश जारी कर दिया गया है कि सचिवालय में तैनात सभी अधिकारी-कर्मचारी मोबाइल फोन हमेशा खुले रखें ताकि आकस्मिक आवश्यकता के समय तत्काल सम्पर्क हो सके। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आदेश में बहुत साफ शब्दों में लिख दिया गया है- ''आवश्यकता पड़ने पर यदि सम्बंधित अधिकारियों से सम्पर्क नहीं हो पाता है तो उसके विरुद्ध अधिकारी-कर्मचारी सेवा नियमावली 1956 के अन्तर्गत कार्यवाही की जा सकती है।''
अधिकारियों-कर्मचारियों की इस नाफरमानी पर सरकार को गुस्सा आना स्वाभाविक भी है। आवश्यकता पड़ने पर किसी भी समय सम्पर्क करने के नजरिए से सरकार ने सचिवालय में तैनात सभी कर्मचारियों और विशेष सचिव स्तर तक के अधिकारियों को अपने स्तर से मोबाइल फोन उपलब्ध करा रखे हैं। बकायदा उनके बिल का भुगतान सरकार करती है। लेकिन जिस नजरिए से यह सुविधा उपलब्ध कराई गई, वह पूरी होती नहीं दिखती। आदेश में कहा गया है, ''कतिपय मोबाइल बंद मिलते हैं या फिर उनके उत्तर प्राप्त नहीं होते। ऐसी स्थिति में आकस्मिक आवश्यकता पड़ने पर एक तरफ जहां सम्बंधित अधिकारियों से सम्पर्क नहीं हो पाता, वहीं शासकीय काम में भी बाधा पड़ती है।''
कैसे रुकेंगे हादसे
रविवार की सुबह-सुबह गोरखपुर से दिल दुखाने वाली एक खबर आई. गुलरिहा थाना क्षेत्र में बरगदही गांव के पास ट्रक व जीप में हुई भीषण टक्कर में जवाहर नवोदय विद्यालय महराजगंज के नवीं कक्षा में पढ़ने वाले चार छात्रों और जीप चालक की मौत हो गयी। इसमें विद्यालय के सात अन्य छात्र और एक कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हो गये हैं। हादसे में घायल एक छात्रा का इलाज निजी चिकित्सालय में चल रहा है, बाकी को मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया है। डाक्टरों ने सभी की हालत गंभीर बतायी है। बालू लदे ट्रक का अगला पहिया टूट कर महिन्द्रा मैक्स से टकरा जाने की वजह से यह हादसा हुआ। नवोदय विद्यालय के छात्र और महराजगंज निवासी राकेश प्रसाद अग्रहरी के पुत्र रंजीत अग्रहरी , यहीं के राममिलन चौरसिया के पुत्र दीपक चौरसिया , संतराम पटेल की पुत्री प्रियंका पटेल (16 वर्ष), सिसवा महराजगंज में रहने वाले बिहार निवासी अशोक कुमार राव के पुत्र आशुतोष राव (16 वर्ष) तथा जीप चालक गोरखपुर निवासी कबीर (30 वर्ष) की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गयी। घायलों में महराजगंज और कुशीनगर के बच्चे तथा कर्नाटक के देवनागेर के जवाहर नवोदय विद्यालय की स्टाफ नर्स बीए रहमान परीदेवी (35 वर्ष) शामिल हैं। जवाहर नवोदय विद्यालय महराजगंज के नवी कक्षा के छात्र इन विद्यालयों में राष्ट्रीय एकता अभियान माइग्रेन क्लास के तहत जुलाई में देवनागर(कर्नाटक) के नवोदय विद्यालय गये थे। यह बच्चे दशहरा व दीपावली के अवकाश पर घर वापस आ रहे थे।
आइये, गोरखपुर से आई इस दुखद खबर की रौशनी में सारे देश में बढती सड़क दुर्घटनाओं की सीमित समीछा कर लेते हैं. आंकडों के मुताबिक भारत दुनिया में सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाओं वाला देश है. यहाँ हर एक हज़ार गाड़ियों पर कम से कम ३५ दुर्घटनाएं होती हैं. जबकि विकसित देशों में इतनी ही गाड़ियों पर सिर्फ ४ से ५ दुर्घटनाएं होती हैं. यानि भारत में विकसित देशों के मुकाबले तीन गुना सड़क दुर्घटनाएं होती हैं. एक अनुमान के मुताबिक इनमे से ८० प्रतिशत दुर्घटनाएं इंसानी गलती के कारण होती हैं. हम सब जानते हैं कि भारत में ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करना कितना आसान है. लापरवाही से गाड़ी चलाने की सजा भी बेहद मामूली है. चौराहों पर तैनात पुलिसवाले १०-२० रूपये की रिश्वत लेकर ट्रक- बसों को नो एंट्री ज़ोन में बे-रोकटोक छोड़ देते हैं. अब वक़्त आ गया है कि सरकार इस बारे में कुछ कड़े कदम उठाये.
आइये, गोरखपुर से आई इस दुखद खबर की रौशनी में सारे देश में बढती सड़क दुर्घटनाओं की सीमित समीछा कर लेते हैं. आंकडों के मुताबिक भारत दुनिया में सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाओं वाला देश है. यहाँ हर एक हज़ार गाड़ियों पर कम से कम ३५ दुर्घटनाएं होती हैं. जबकि विकसित देशों में इतनी ही गाड़ियों पर सिर्फ ४ से ५ दुर्घटनाएं होती हैं. यानि भारत में विकसित देशों के मुकाबले तीन गुना सड़क दुर्घटनाएं होती हैं. एक अनुमान के मुताबिक इनमे से ८० प्रतिशत दुर्घटनाएं इंसानी गलती के कारण होती हैं. हम सब जानते हैं कि भारत में ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करना कितना आसान है. लापरवाही से गाड़ी चलाने की सजा भी बेहद मामूली है. चौराहों पर तैनात पुलिसवाले १०-२० रूपये की रिश्वत लेकर ट्रक- बसों को नो एंट्री ज़ोन में बे-रोकटोक छोड़ देते हैं. अब वक़्त आ गया है कि सरकार इस बारे में कुछ कड़े कदम उठाये.
पहले शाही हत्याकांड का सच सामने लाओ
प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल
राजशाही के खिलाफ संघर्ष के दौरान हुई राजनीतिक हत्याओं की जांच कराने संबंधी नेपाल सरकार के ताजा ऐलान से देश की सियासत गरमा गयी है। लेकिन इसी के साथ लोग पूछने लगे हैं की आखिर २००१ में नारायण हिति महल में महाराजा वीरेंद्र सहित उनके पूरे परिवार की नृशंश हत्या का सच कब सामने आयेगा?
देश के प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल का कहना है कि उनकी सरकार राजनीतिक हत्याओं की जांच के लिए हरहाल में आयोग गठित करेगी। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के उद्घाटन सत्र में कहा, 'सरकार निष्पक्ष आयोग के गठन के लिए प्रतिबद्ध है।' दरअसल इन हत्याओं के लिए माओवादी विद्रोहियों को जिम्मेदार माना जाता है। नेपाल में संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त रिचर्ड बैनेट ने इन राजनीतिक हत्याओं के लिए माओवादी विद्रोहियों को दोषी ठहराया है। उन्होंने हत्या के कई मामलों में यूनीफाइड कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल-माओवादी के खिलाफ जांच का आदेश भी दिया है। बैनेट के मुताबिक माओवादियों ने खुद एक बस धमाके में अपना हाथ होने का दावा किया था। इस बस धमाके में 50 लोगों की जान चली गई थी। लेकिन, इस घटना में अब तक किसी के खिलाफ कोई मामला नहीं चलाया गया। बैनेट ने नेपाल सरकार को लिखे एक पत्र में कहा है, 'मानवाधिकारों का हनन करने वालों को बढ़ावा देने और उन्हें बचाने का चलन बंद होना चाहिए, चाहे ये लोग नेपाल सेना के हों या पूर्व माओवादी विद्रोही।'
राजशाही के खिलाफ संघर्ष के दौरान हुई राजनीतिक हत्याओं की जांच कराने संबंधी नेपाल सरकार के ताजा ऐलान से देश की सियासत गरमा गयी है। लेकिन इसी के साथ लोग पूछने लगे हैं की आखिर २००१ में नारायण हिति महल में महाराजा वीरेंद्र सहित उनके पूरे परिवार की नृशंश हत्या का सच कब सामने आयेगा?
देश के प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल का कहना है कि उनकी सरकार राजनीतिक हत्याओं की जांच के लिए हरहाल में आयोग गठित करेगी। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के उद्घाटन सत्र में कहा, 'सरकार निष्पक्ष आयोग के गठन के लिए प्रतिबद्ध है।' दरअसल इन हत्याओं के लिए माओवादी विद्रोहियों को जिम्मेदार माना जाता है। नेपाल में संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त रिचर्ड बैनेट ने इन राजनीतिक हत्याओं के लिए माओवादी विद्रोहियों को दोषी ठहराया है। उन्होंने हत्या के कई मामलों में यूनीफाइड कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल-माओवादी के खिलाफ जांच का आदेश भी दिया है। बैनेट के मुताबिक माओवादियों ने खुद एक बस धमाके में अपना हाथ होने का दावा किया था। इस बस धमाके में 50 लोगों की जान चली गई थी। लेकिन, इस घटना में अब तक किसी के खिलाफ कोई मामला नहीं चलाया गया। बैनेट ने नेपाल सरकार को लिखे एक पत्र में कहा है, 'मानवाधिकारों का हनन करने वालों को बढ़ावा देने और उन्हें बचाने का चलन बंद होना चाहिए, चाहे ये लोग नेपाल सेना के हों या पूर्व माओवादी विद्रोही।'
पूर्वांचल के नेताओं को खुला पत्र: 'एक मच्छर ने तुम्हें .......क्या बना दिया'?
'Culex tritaeniorhynchus' जी हाँ यही नाम है उस मच्छर का जिसने पिछले ३२ साल से पूर्वांचल में तहलका मचा रखा है. उसी पूर्वांचल में जहाँ एक से एक बाहुबली- विधायक, सांसद बने फिरते हैं. मज़ाल है कि इनकी नाक पर मक्खी भी बैठ जाये. ये वे नेता हैं जिनके नाम से इलाके में चिराग जलते हैं. इन नेताओं की सवारी सडकों पर निकलती है तो आम लोग खड़े होकर काफिले में शामिल गाडियां गिनते हैं. इन महानुभाओं की तारीफ लिखने बैठ जाऊं तो शायद पूरा दिन कम पड़ जाये. लेकिन आश्चर्ये होता है कि ऊपर उल्लखित एक अदद मच्छर ने पूर्वांचल की शान के प्रतीक इन नेताओं को.........बना दिया है.
अब आप जरा इस विशेष मच्छर की विशेषता भी सुन लीजिये. उत्तरी एशिया और अफ्रीका के कुछ इलाकों में जन्मे ये मच्छर महोदय, हमारे यहाँ धान के खेतों में तेजी से अपनी वंशवृद्धि करते हैं. पालतू सूअर और जंगली पंछी जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस के वाहक हैं. 'क्युलेक्स' मच्छर के पोते-परपोते जब इन्हें काटते हैं तो ये भी जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस से भरे-पूरे हो जाते हैं. फिर जब ये मच्छर हमारे-आप जैसे किसी इंसान को काटते हैं तो हमें जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस हो जाता है. जब ये मच्छर किसी बच्चे को काटता है तो एनसेफ्लाईटिस का वायरस और भी तेजी से असर डालता है. बीमारी के शुरूआती दौर में हल्का बुखार और हल्का सिरदर्द होता है. लेकिन बीमारी गंभीर होने के साथ ही बुखार की तीव्रता बढती जाती है. मरीज़ को तेज़ सिरदर्द के साथ झटके आते हैं. हालत बिगड़ने पर वो कोमा में भी जा सकता है. इस बीमारी के करीब ७० फीसदी मरीज़ मौत या विकलांगता के शिकार हो जाते हैं. जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस मच्छर काटने के ५ से १५ दिनों के भीतर अपना असर दिखाता है. एशिया में यही वायरस, वायरल एनसेफ्लाईटिस का भी बडा कारण है. एशिया में हर साल इसके ३५ हज़ार से ५० हज़ार मामले सामने आते हैं. लेकिन आपको हैरानी होगी की अपने नागरिकों की जान की कीमत समझने वाले अमेरिका में इस बीमारी का साल भर में हद से हद सिर्फ एक मामला सामने आता है. वो भी सेना के उन जवानों में जो किसी वजह से एशिया की यात्रा करते हैं.
हमारे लिए दुर्भाग्य की एक बात ये भी है की इस बीमारी का अब तक कोई 'तय' इलाज नहीं है. सिर्फ कुछ सपोर्टिव दवाओं के सहारे मरीजों को बचाने की कोशिश की जाती है. ये बीमारी शहरी इलाकों में नहीं पाई जाती लिहाजा गाँव-देहात में रहने वाले इस बीमारी के सबसे बडे शिकार बनते हैं. भारत से पहले जिन देशों में इस महामारी ने सर्वाधिक तबाही मचाई है उनमें चाइना, कोरिया, जापान, ताइवान और थाईलैंड शामिल थे. लेकिन इन सभी देशों ने ब्यापक टीकाकरण के जरिये इस बीमारी पर काबू पा लिया. लेकिन अभी भी जो देश इस बीमारी की चपेट में रह गए हैं उनमें वियतनाम,कम्बोडिया, नेपाल, म्यामार, मलेशिया और भारत शामिल हैं. भारत में पूर्वांचल का इलाका इस बीमारी से सर्वाधिक पीड़ित है.
अब आप जरा इस विशेष मच्छर की विशेषता भी सुन लीजिये. उत्तरी एशिया और अफ्रीका के कुछ इलाकों में जन्मे ये मच्छर महोदय, हमारे यहाँ धान के खेतों में तेजी से अपनी वंशवृद्धि करते हैं. पालतू सूअर और जंगली पंछी जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस के वाहक हैं. 'क्युलेक्स' मच्छर के पोते-परपोते जब इन्हें काटते हैं तो ये भी जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस से भरे-पूरे हो जाते हैं. फिर जब ये मच्छर हमारे-आप जैसे किसी इंसान को काटते हैं तो हमें जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस हो जाता है. जब ये मच्छर किसी बच्चे को काटता है तो एनसेफ्लाईटिस का वायरस और भी तेजी से असर डालता है. बीमारी के शुरूआती दौर में हल्का बुखार और हल्का सिरदर्द होता है. लेकिन बीमारी गंभीर होने के साथ ही बुखार की तीव्रता बढती जाती है. मरीज़ को तेज़ सिरदर्द के साथ झटके आते हैं. हालत बिगड़ने पर वो कोमा में भी जा सकता है. इस बीमारी के करीब ७० फीसदी मरीज़ मौत या विकलांगता के शिकार हो जाते हैं. जापानी 'बी' एनसेफ्लाईटिस वायरस मच्छर काटने के ५ से १५ दिनों के भीतर अपना असर दिखाता है. एशिया में यही वायरस, वायरल एनसेफ्लाईटिस का भी बडा कारण है. एशिया में हर साल इसके ३५ हज़ार से ५० हज़ार मामले सामने आते हैं. लेकिन आपको हैरानी होगी की अपने नागरिकों की जान की कीमत समझने वाले अमेरिका में इस बीमारी का साल भर में हद से हद सिर्फ एक मामला सामने आता है. वो भी सेना के उन जवानों में जो किसी वजह से एशिया की यात्रा करते हैं.
हमारे लिए दुर्भाग्य की एक बात ये भी है की इस बीमारी का अब तक कोई 'तय' इलाज नहीं है. सिर्फ कुछ सपोर्टिव दवाओं के सहारे मरीजों को बचाने की कोशिश की जाती है. ये बीमारी शहरी इलाकों में नहीं पाई जाती लिहाजा गाँव-देहात में रहने वाले इस बीमारी के सबसे बडे शिकार बनते हैं. भारत से पहले जिन देशों में इस महामारी ने सर्वाधिक तबाही मचाई है उनमें चाइना, कोरिया, जापान, ताइवान और थाईलैंड शामिल थे. लेकिन इन सभी देशों ने ब्यापक टीकाकरण के जरिये इस बीमारी पर काबू पा लिया. लेकिन अभी भी जो देश इस बीमारी की चपेट में रह गए हैं उनमें वियतनाम,कम्बोडिया, नेपाल, म्यामार, मलेशिया और भारत शामिल हैं. भारत में पूर्वांचल का इलाका इस बीमारी से सर्वाधिक पीड़ित है.
डॉक्टर आर.एन.सिंह की ललकार:'दिमागी बुखार रहेगा या मैं'
गोरखपुर के सुमेर सागर स्थित शंकर क्लिनिक पर रोज की तरह आज भी पैर रखने की जगह नहीं है. करीब तीन सौ वर्ग फीट की जगह में मरीज़ भरे पड़े हैं. सहायक पसीने से तरबतर हैं. शीशे से बंद केबिन में एसी ना चलने की वजह से हर शख्स कि हालत ख़राब है. अन्दर-बाहर गर्मी के मारे बच्चों का बिलखना माहौल को और मुश्किल बना रहा है. लेकिन इन मुश्किल हालात का, बिलकुल सफ़ेद बालों वाले उस 'उभरते मसीहा' की शख्सियत पर जरा भी असर नहीं पड़ता. अवकाश प्राप्ति की उम्र के करीब पहुँच चुके उस शख्स का नाम आज किसी तार्रुफ़ का मोहताज़ नहीं. डॉक्टर आर. एन.सिंह! एन्सेफलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कम्पैनर डॉक्टर आर.एन.सिंह ने एक ऐलान किया है. ऐलान है पूर्वांचल के मासूमों को जानलेवा बीमारी 'जापानी एन्सेफलाइटिस' के चंगुल से छुटकारा दिलाने का. वरना ....गोरखपुर छोड़ देने का. डॉक्टर आर.एन.सिंह ने मेरठ मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. करने के बाद गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ज्वाइन किया था. इसी दरमियाँ सन १९७८ में जानलेवा बीमारी एन्सेफलाइटिस महामारी की शक्ल में सामने आई. मेडिकल कॉलेज में हंगामा मच गया. ३२ साल पहले उस खौफनाक मंज़र को याद कर डॉक्टर सिंह आज भी खुद पर लानत देने लगते हैं. ''आखिर मैं इस कदर बच्चों को अपनी आँखों के सामने मरते देखने को मजबूर क्यों हुआ? मैं कुछ कर क्यों नहीं सका? मेरी पढाई का आखिर क्या मतलब निकला?" डॉक्टर सिंह को सरकारी मुलाजिम बनने की कोई ख्वाइश नहीं थी. वे तो बस यहाँ अपनी डिग्री के मायने तलाशने आये थे. लेकिन साल दर साल हजारों बच्चों कि बेबस मौतों ने उनके लिए 'बच्चों का डॉक्टर' होने का मतलब ही बदल दिया है. सन २००५ (वो साल जब डॉक्टर सिंह ने अपना अभियान शुरू किया था ) से आज तक शायद ही कोई ऐसा दिन गया हो जब उन्होंने इस बडे मकसद के लिए काम ना किया हो.
सन २००५ यानि एन्सेफलाइटिस का तांडव शुरू होने के २८ साल बाद तक पूर्वांचल में कोई संगठन या राजनितिक दल इस काम के लिए आगे नहीं आया था. मीडिया में हर साल मौतों के आंकड़े छपते थे. लोग सिर्फ इतना जानते थे की एक बीमारी है, जिसने हजारों बच्चों को अपना शिकार बनाया है. लेकिन इससे मुकाबला कैसे किया जाये. अपने बच्चों को इसके चंगुल से बचाया कैसे जाये किसी को मालूम नहीं था. बल्कि कोई इस बारे में सोचना भी नही चाहता था. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में कभी डॉक्टर सिंह के साथी रहे डॉक्टर के.पी.कुशवाहा और बाल रोग विभागाध्यछ रहे डॉक्टर वाई.डी.सिंह (मौजूदा एम.एल.सी) दिन रात जूझते रहते थे. वार्ड नंबर ६० में डॉक्टर ए.के.राठी की आवाज़ गूंजती रहती थी. लेकिन नतीजा सिफर. हर साल उसी गति से बच्चे मरते और मरते जाते थे.
सब जानते थे कि इन बच्चों को बचाने का अकेला हथियार वो टीका है जिसे चाइना से आयात करना पड़ेगा. लेकिन जब इलाके के नेताओं को सांप सूंघ गया हो तो सरकार से इसकी दरखास्त कौन करता? और सरकार सिर्फ दरखास्त से मान क्यों जाती? तब सन २००५ में डॉक्टर आर.एन.सिंह ने अपना आन्दोलन शुरू किया. गोरखपुर,कुशीनगर, देवरिया,बस्ती,महराजगंज आदि जिलों में काली पट्टियां बांधकर जूलूस निकाले. एक लाख से जयादा मांगपत्र प्रधानमंत्री को भेजे गये. मीडिया में इन ख़बरों की सुर्खियाँ और एन्सेफलाइटिस की महामारी ने तत्कालीन राज्यपाल टी.वी.राजेश्वर को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के दौरे के लिए मजबूर कर दिया. फिर बारी-बारी राहुल गाँधी, सलमान खुर्शीद, मुलायम सिंह सब पहुंचे. मुलायम सिंह ने मुआवजे का एलान किया. राहुल ने मनमोहन सिंह के जरिये टीकों का आयात करवाया. जापानी एन्सेफलाइटिस के ये टीके युधस्तर पर लगवाए गये. इन टीकों का आयात चाइना से किया गया था. टीके बनाने वाली कम्पनी के मुताबिक कम से कम दो डोज़ लगाने पर ही ये टीके कारगर होते हैं. लेकिन केंद्र सरकार को लगा कि हिन्दुस्तानी बच्चों को इसकी एक ही डोज़ लग जाये तो बहुत. सो, बस एक डोज़ लगवाकर सरकार ने अपना काम पूरा कर लिया. नतीजतन जिन बच्चों को टीका लगा वे भी इस बीमारी के प्रकोप से बच नही सके.
सूबे में सरकार बदली तो नई मुख्यमंत्री मायावती ने मुलायम सिंह द्वारा दिया गया मुआवजा बंद कर दिया. बच्चे यूँ ही मरते और विकलांग होते जा रहे हैं. डॉक्टर आर.एन.सिंह ने अपना और अपने लोगों का खून बहाना शुरू कर दिया है. उन्होंने केंद्र सरकार को एन्सेफलाइटिस उन्मूलन के लिए बिन्दुवार कार्यक्रम सौंपा है. जिसे रास्ट्रीय स्तर पर रास्ट्रीय एन्सेफलाइटिस उन्मूलन अभियान (नीप) या किसी और नाम से लागू करने की उनकी मांग है. डॉक्टर आर.एन.सिंह, उनके पिता रामशंकर सिंह, पत्नी डॉक्टर वीणा सिंह, बहन स्नेह सिंह, दामाद मनीष सिंह, सुरजीत सिंह, बेटी विष्णुप्रिया, लिटिल, नाती नोनू, लावण्या सिंह सहित परिवार, अनुवाई और मित्रमंडली का एक-एक सदस्य इस अभियान से जुड़ा है. दशहरा के अवसर पर जब सारा संसार राम (अच्छाई) द्वारा रावन (बुराई) के वध का पर्व रावन को जला कर मना रहा है, डॉक्टर सिंह, अपने लोगों के साथ खून से चिठ्ठियाँ लिखकर माँ भवानी से, पूर्वांचल के बच्चों को निवाला बनाते, एन्सेफलाइटिसइस रूपी महिसासुर के, वध की प्रार्थना कर रहे हैं. डॉक्टर सिंह और उनके साथी इसके पहले खून से लिखे हजारों पत्र प्रधानमंत्री, रास्त्रपति, लोकसभा स्पीकर और यू.पी.ए. अध्यछ सोनिया गाँधी को भेज चुके हैं. डॉक्टर सिंह का ये ऐलान उनका समर्पण व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है, 'अगले पांच सालों में पूर्वांचल में या तो जापानी एन्सेफलाइटिस होगी या मैं!'
सन २००५ यानि एन्सेफलाइटिस का तांडव शुरू होने के २८ साल बाद तक पूर्वांचल में कोई संगठन या राजनितिक दल इस काम के लिए आगे नहीं आया था. मीडिया में हर साल मौतों के आंकड़े छपते थे. लोग सिर्फ इतना जानते थे की एक बीमारी है, जिसने हजारों बच्चों को अपना शिकार बनाया है. लेकिन इससे मुकाबला कैसे किया जाये. अपने बच्चों को इसके चंगुल से बचाया कैसे जाये किसी को मालूम नहीं था. बल्कि कोई इस बारे में सोचना भी नही चाहता था. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में कभी डॉक्टर सिंह के साथी रहे डॉक्टर के.पी.कुशवाहा और बाल रोग विभागाध्यछ रहे डॉक्टर वाई.डी.सिंह (मौजूदा एम.एल.सी) दिन रात जूझते रहते थे. वार्ड नंबर ६० में डॉक्टर ए.के.राठी की आवाज़ गूंजती रहती थी. लेकिन नतीजा सिफर. हर साल उसी गति से बच्चे मरते और मरते जाते थे.
सब जानते थे कि इन बच्चों को बचाने का अकेला हथियार वो टीका है जिसे चाइना से आयात करना पड़ेगा. लेकिन जब इलाके के नेताओं को सांप सूंघ गया हो तो सरकार से इसकी दरखास्त कौन करता? और सरकार सिर्फ दरखास्त से मान क्यों जाती? तब सन २००५ में डॉक्टर आर.एन.सिंह ने अपना आन्दोलन शुरू किया. गोरखपुर,कुशीनगर, देवरिया,बस्ती,महराजगंज आदि जिलों में काली पट्टियां बांधकर जूलूस निकाले. एक लाख से जयादा मांगपत्र प्रधानमंत्री को भेजे गये. मीडिया में इन ख़बरों की सुर्खियाँ और एन्सेफलाइटिस की महामारी ने तत्कालीन राज्यपाल टी.वी.राजेश्वर को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के दौरे के लिए मजबूर कर दिया. फिर बारी-बारी राहुल गाँधी, सलमान खुर्शीद, मुलायम सिंह सब पहुंचे. मुलायम सिंह ने मुआवजे का एलान किया. राहुल ने मनमोहन सिंह के जरिये टीकों का आयात करवाया. जापानी एन्सेफलाइटिस के ये टीके युधस्तर पर लगवाए गये. इन टीकों का आयात चाइना से किया गया था. टीके बनाने वाली कम्पनी के मुताबिक कम से कम दो डोज़ लगाने पर ही ये टीके कारगर होते हैं. लेकिन केंद्र सरकार को लगा कि हिन्दुस्तानी बच्चों को इसकी एक ही डोज़ लग जाये तो बहुत. सो, बस एक डोज़ लगवाकर सरकार ने अपना काम पूरा कर लिया. नतीजतन जिन बच्चों को टीका लगा वे भी इस बीमारी के प्रकोप से बच नही सके.
सूबे में सरकार बदली तो नई मुख्यमंत्री मायावती ने मुलायम सिंह द्वारा दिया गया मुआवजा बंद कर दिया. बच्चे यूँ ही मरते और विकलांग होते जा रहे हैं. डॉक्टर आर.एन.सिंह ने अपना और अपने लोगों का खून बहाना शुरू कर दिया है. उन्होंने केंद्र सरकार को एन्सेफलाइटिस उन्मूलन के लिए बिन्दुवार कार्यक्रम सौंपा है. जिसे रास्ट्रीय स्तर पर रास्ट्रीय एन्सेफलाइटिस उन्मूलन अभियान (नीप) या किसी और नाम से लागू करने की उनकी मांग है. डॉक्टर आर.एन.सिंह, उनके पिता रामशंकर सिंह, पत्नी डॉक्टर वीणा सिंह, बहन स्नेह सिंह, दामाद मनीष सिंह, सुरजीत सिंह, बेटी विष्णुप्रिया, लिटिल, नाती नोनू, लावण्या सिंह सहित परिवार, अनुवाई और मित्रमंडली का एक-एक सदस्य इस अभियान से जुड़ा है. दशहरा के अवसर पर जब सारा संसार राम (अच्छाई) द्वारा रावन (बुराई) के वध का पर्व रावन को जला कर मना रहा है, डॉक्टर सिंह, अपने लोगों के साथ खून से चिठ्ठियाँ लिखकर माँ भवानी से, पूर्वांचल के बच्चों को निवाला बनाते, एन्सेफलाइटिसइस रूपी महिसासुर के, वध की प्रार्थना कर रहे हैं. डॉक्टर सिंह और उनके साथी इसके पहले खून से लिखे हजारों पत्र प्रधानमंत्री, रास्त्रपति, लोकसभा स्पीकर और यू.पी.ए. अध्यछ सोनिया गाँधी को भेज चुके हैं. डॉक्टर सिंह का ये ऐलान उनका समर्पण व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है, 'अगले पांच सालों में पूर्वांचल में या तो जापानी एन्सेफलाइटिस होगी या मैं!'
नीतिश बाबू इतने से काम नहीं चलेगा
बिहार में बेहतर काम कर रहे नीतीश कुमार ने बीते शुक्रवार को एक और अच्छा काम किया. नीतीश बाबू की पहल के चलते तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित श्रीराम गोकुल टेक्सटाइल प्राइवेट लिमिटेड में बंधक बना कर रखे गये २२ बिहारी मजदूरों को वहां के जिला प्रशासन ने छुड़ा लिया. प्रशासन ने कम्पनी के आठ गुंडों को गिरफ्तार भी किया है. बताया जाता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन श्रमिकों को बंधक बनाए जाने की सूचना मिलने पर इसे गंभीरता से लेते हुए राज्य के गृह विभाग के प्रभारी प्रधान सचिव आमिर सभानी को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। मुख्यमंत्री के निर्देश पर सुभानी ने तमिलनाडु के गृह सचिव, श्रम विभाग के वरिष्ठ पदाधिकारियों और कोयंबटूर के जिलाधिकारी से संपर्क स्थापित किया। सुभानी ने बताया कि तमिलनाडु के गृह सचिव ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कोयंबटूर के कारखाना निरीक्षक को कपड़ा मिल में भेजा और जिला प्रशासन के सहयोग से सभी 22 मजदूरों को मुक्त कराकर शुक्रवार सबेरे जम्मूतवी एक्सप्रेस ट्रेन में बिठा कर उन्हें उनके घर भेज दिया। रोहतास जिले के जिलाधिकारी अनुपम कुमार के मुताबिक कोयंबटूर में रिहा कराए गये सभी श्रमिक करगहर थाना क्षेत्र के लखनपुरा, बसंतपुर और सिरसियां गांव के रहने वाले हैं। इन श्रमिकों के परिवार के लोगों का कहना है कि कपड़ा मिल में काम के दौरान एक मजदूर मनीष कुमार का हाथ कट गया। इसके लिए मुआवजे की इन मजदूरों द्वारा मांग की जा रही थी। इसपर मिल प्रबंधन ने इन्हें मारपीट कर बंधक बना लिया था। उन्होंने बताया कि बंधक बनाए गए इन मजदूरों में शामिल पिंटु कुमार ने किसी तरह मोबाइल फोन से इस घटना की सूचना अपने परिजनों को दी जिसके बाद उन्होंने जिला प्रशासन से संपर्क साधा। इसके बाद प्रदेश सरकार हरकत में आई। जिलाधिकारी रोहतास ने बताया इन मजदूरों को बंधक बनाने वाली कंपनी के आठ गुर्गो को दो हथियार के साथ गिरफ्तार होने की जानकारी कोयंबटूर प्रशासन द्वारा दी गई है। उन्होंने बताया कि मुक्त हुए मजदूरों को कोयंबटूर जिला प्रशासन ने एक-एक हजार रुपये देकर ट्रेन पर सवार कर बिहार के लिए रवाना कर दिया है.
भाई बड़ी ख़ुशी की बात है! हमारे नीतीश बाबू इतने संवेदनशील हैं कि उन्होंने गरीब मजदूरों के बारे में इतना सोचा. लेकिन भैया बस इतने से बात बनाने वाली नहीं है. असली सवाल तो ये है की तमिलनाडु से लौटने के बाद बिहार में ये मजदूर करेंगे क्या? दरअसल इसी एक सवाल ने बिहार और उत्तर प्रदेश के लाखों नौजवानों को तमिलनाडु से लेकर कश्मीर तक और मुंबई से लेकर असम तक पिटने पर मजबूर कर दिया है. जब तक इन दोनों प्रदेशों के नेता अपने यहाँ रोजगार और तरक्की के बेहतर रास्ते नहीं तलाशते, कोयंबटूर जैसे हादसे तो होते ही रहेंगे.
शनिवार, 26 सितंबर 2009
मंगलवार, 22 सितंबर 2009
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)


















